भाषाओं की आवाज़ ये हिंदी
भाषा के जीवन में,
इक भाषा ने बहुत कहा,
विदेशी हो या देशी,
सबको अपना परिवार कहा,
इसके लिए संघर्ष हुए,
इसके लिए बहुत सहा,
फिर इसका जीवन निर्भीक रहा,
सबके जीवन के संबंध में,
हिन्दी भाषा ने बहुत कहा,
राजपत्रित भाषा है,
संवैधानिक भाषा है,
लोगों की भाषा है,
सपनों की भाषा है,
साहित्य की भाषा है,
जन मानस की भाषा है,
रचनाओं की भाषा है,
परिपक्व ये भाषा है,
राष्ट्रभाषा संघर्ष है,
पर दिलों की भाषा है,
मनोरंजन की भाषा है,
काम काज की भाषा है,
कविता की भाषा है,
कवि की भाषा है,
स्त्री की भाषा है,
भाव की भाषा है,
अपनी माँ संस्कृत के,
गुणी अक्षरों,
शब्दों, व्याकरण
क्रम को,
अपनी आत्म में उतारा है,
जिस भाषा को देखा,
उसको गले लगाया है,
आज के,
Gen-z की,
ये ही-इंग्लिश भाषा है,
ज्ञान की भाषा है,
सरकारी ये भाषा है,
दो संस्कृतियों की बीच की धुरी है,
धुरी की भाषा है,
हिन्दी मन की भाषा है,
हिन्दी ने,
देश को हिन्दुस्तान बनाया,
देश का मान बढ़ाया,
फ़िल्मों की भाषा है,
धारावाहिकों की भाषा है,
संगीत की भाषा है,
गीतों की भाषा है,
स्थानीय भाषाओं में आज भी,
इसके लिए उदासी है,
जैसे दक्षिण को लगता,
ये थोपी गयी हो,
लेकिन उनको देश से,
जोड़ने वाली यही भाषा है,
कोई बात नहीं,
होता है संघर्ष,
जैसे मानव का मानव से,
सफ़लता का सफ़लता से,
खोज का खोज से,
टिप्पणी का टिप्पणी से,
प्रेम का मैं से,
मैं का प्राणी से,
प्राणी का प्रकृति से,
प्रकृति का नियम से,
नियम का काल से,
काल का कारण से,
कारण का आधार से,
आधार का विश्वास से,
विश्वास का ब्रह्मांड से,
ब्रह्माण्ड का चेतना से,
चेतना का आनंद से,
आनंद का सत्य से,
सत्य का माया से,
माया का अस्तित्व से,
अस्तित्व का मोक्ष से,
मोक्ष का मौन से,
मौन का समाधि से,
समाधि का ध्यान से,
ध्यान का ईश्वर से,
ईश्वर के अपने विचार हैं,
जो मानव के मस्तिष्क में लिखता है,
और मानव उन्हें हिन्दी भाषा में प्रकट करता है,
ताकि जन जन तक पहुँचे,
इसी भाषा में,
प्रेम शब्द ने,
प्रेम का आभास कराया,
आत्मा ने होने का,
शब्द में कितनी शक्ति है,
हिन्दी यही बताती है,
ये भाषा उस बच्चे की तरह है,
कि जिससे किसी से घृणा नहीं,
ये सबके पास है,
सबकी है,
हिन्दी सबकी है,
ये हमारी उन विचारों,
कंठ, होंठों, लफ्जों,
के प्राण है,
हाँ संघर्ष हमारी राजस्थानी का भी है,
ऐसा ही संघर्ष,
जैसा भारत में हिंदी के लिए है,
वैसा राजस्थान में राजस्थानी के लिए,
पर स्थानीय भाषा माँ है,
पर हिन्दी वो भाषा है,
जो आजीवन साथ है,
आप इसके लिए कृतज्ञ तो इसको,
पुकारते रहें,
और नहीं हैं तो भी,
अपने अस्तित्व के सम्मान की तरह,
इसका भी सम्मान करें,
भाषाओं की आवाज ये हिंदी। ।
- ललित दाधीच


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