वे कहते हैं —
समय बदल रहा है,
मैं देखती हूँ —
बस डर के चेहरे नए हुए हैं।
एकलव्य,
तुम फिर तैयार रहना,
सभ्यताओं के दरबार में
अंगूठे आज भी माँगे जाते हैं।
कर्ण,
तुम्हारी पीड़ा अभी समाप्त नहीं हुई,
वंश और विशेषाधिकार की दीवारें
अब भी ऊँची खड़ी हैं।
सीता,
तुम्हारी अग्निपरीक्षाएँ
कभी सचमुच खत्म नहीं हुईं,
बस उनके नाम बदल गए।
शंबूक,
सवाल पूछने वालों की गर्दन पर
आज भी परंपराओं की तलवारें टंगी हैं।
और युवाओं,
तुम भी सावधान रहना —
कभी धर्म के नाम पर,
कभी जाति के नाम पर,
कभी राष्ट्र के नाम पर
तुम्हारे भीतर का मनुष्य बाँटा जाएगा।
भगत सिंह,
तुम अब भी नास्तिक हो क्या?
यहाँ आज भी
सवाल पूछने वालों से
सबसे अधिक भय खाया जाता है।
फिर भी —
हर अँधेरे दौर में
कोई न कोई खुदीराम
जन्म लेता है,
कोई न कोई कविता
सत्ता से आँख मिलाती है।
क्योंकि
नागार्जुन अभी ज़िंदा हैं।


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
The Flower of Word by Vedvyas Mishra







