अंतर्मन में द्वंद्व छिड़ा है,
मन का दरवाज़ा बंद पड़ा है।
हृदय-कपाट अब खोलें कैसे,
बात मन की बोलें कैसे?
कुछ दर्द छिपे हैं पलकों में,
कुछ ख़्वाब दबे हैं साँसों में।
लब ख़ामोश, नयन बोल रहे,
हम ख़ुद से ही कुछ पूछ रहे।
मन में उठते प्रश्न अनेक,
किससे कहें हम दर्द-ए-दिल?
कौन समझेगा मौन हमारा,
कौन सुनेगा हाल-ए-दिल?
हँसते चेहरे के पीछे देखो,
कितने गहरे घाव छिपे हैं,
बाहर से जो शांत दिखाई दें,
भीतर कितने तूफ़ान उठे हैं।
कभी मन कहता सब कह डालूँ,
कभी मौन का आँचल थामूँ,
कभी हृदय की गाँठें खोलूँ,
कभी अपने आँसू पी जाऊँ।
काश! कोई ऐसा अपना हो,
जो बिन बोले सब जान सके,
मेरी ख़ामोशी के पीछे छिपे,
हर दर्द को पहचान सके।
जो थाम ले काँपते हाथों को,
जो पढ़ ले मन की भाषा को,
जो बिना किसी प्रश्न के समझे,
मेरी आँखों की परिभाषा को।
कब तक मन से मन लड़ता रहे,
कब तक दर्द हृदय में पलता रहे?
कभी तो मौन भी टूटेगा,
कभी अंतर्मन भी खुलेगा।
द्वंद्व भले ही मन में छिड़ा है,
आशा का दीप अभी भी जला है।
एक दिन ये बादल छँट जाएँगे,
मन के सारे द्वंद्व मिट जाएँगे।
-सरिता पाठक
सर्वाधिकार अधीन है


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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