अभी भी कुछ बेगाना लगता है,
अपना होने में भी ज़माना लगता है,
गरीबों में भी रईसी है,
इसलिए उनका घर नहीं घराना लगता है,
मेहनत भी सभी की नहीं होती,
उसके लिए भी एक दीवाना लगता है,
तौर तरीकों से सारा जंहा बनावटी ठिकाना लगता है,
बूँदों ने ही खुद को समेटा है,
बाकी हमारा जीना तो कयामत को मयखाना लगता है,
आँसू भी गिरकर शातिर हुए हैं "ललित",
बालों से ही खेल गए वो मोहब्बत,
हमें तो जिक्र करने में ही पूरा याराना लगता है। ।
- ललित दाधीच


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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