"प्रेम का चिरंतन धन"
तुम दीपावली का पटाखा नहीं,
धनतेरस का धन हो प्रिये!
क्षणभर की चमक नहीं,
जीवनभर का चिर संबल हो प्रिये!
तुम शोर नहीं, मन की मधुरिम शांति हो,
तुम केवल आकर्षण नहीं।
प्रेम की अमिट क्रांति हो,
तुम दीपों की लौ नहीं।
अंतर्मन का प्रकाश हो,
तुम कोई स्वप्निल कल्पना नहीं।
मेरे विश्वास का आकाश हो।
तुम्हारे होने से जीवन में,
उत्सव का संचार होता है।
तुम्हारी एक मुस्कान से,
हर दुःख तिरोहित होता है।
तुम वह सुख हो,
जिसे शब्दों में बाँधा नहीं जा सकता।
तुम वह अपनापन हो,
जिसे समय भी मिटा नहीं सकता।
तुम सोने-चाँदी के आभूषणों से बढ़कर,
मेरे जीवन का अनमोल आभरण हो प्रिये!
तुम दीपावली का पटाखा नहीं,
धनतेरस का धन हो प्रिये!
तुम्हारे साथ में साधारण दिवस भी,
त्योहार बन जाता है।
सूना-सा मन भी प्रेम का सुंदर,
संसार बन जाता है।
तुम साथ रहो तो,
कठिन राहें भी सरल लगती हैं।
तुम पास रहो तो सूखी डालियाँ भी,
तरु-सी हरी लगती हैं।
न तुम्हें पाने की कोई सीमा,
न तुम्हें चाहने का अंत है।
तुमसे ही आरंभ मेरी हर प्रार्थना,
तुम पर ही उसका अंत है।
तुम मेरे मौन की भाषा,
मेरी धड़कन का स्पंदन हो।
तुम मेरी आँखों का स्वप्न,
और हृदय का चंदन हो।
तुम वह निधि नहीं जिसे तिजोरी में,
सजाकर रखा जाए।
तुम वह अनमोल अनुभूति हो,
जिसे हृदय में बसाया जाए।
तुम्हारी उपस्थिति ही,
मेरे लिए सबसे बड़ा उपहार है।
तुम्हारे होने से ही जीवन में,
बहार ही बहार है।
न चाहिए मुझे महलों का वैभव,
न रत्नों का भंडार, न चाहिए जग की प्रशंसा,
न कोई राजसी सत्कार।
बस तुम्हारा विश्वास रहे,
तुम्हारा प्रेम बना रहे।
जीवन की प्रत्येक साँझ में,
तुम्हारा साथ सजा रहे।
तुम अमावस की रात में,
पूर्णिमा का उजियारा हो।
तुम भटकते हुए पथिक का,
सबसे सुंदर किनारा हो।
तुम तपती हुई धरा पर,
सावन की पहली फुहार हो।
तुम मेरे जीवन के उपवन का,
सबसे सुंदर पुष्पहार हो।
तुम्हारे प्रेम में कोई दिखावा,
कोई बनावट नहीं है।
यह वह अनुभूति है,
जिसमें स्वार्थ की मिलावट नहीं है।
तुम्हें चाहना मेरे लिए,
कोई क्षणिक अभिलाषा नहीं।
तुमसे बढ़कर इस हृदय की,
कोई दूसरी परिभाषा नहीं।
मैं धनतेरस पर सोना खरीदूँ
या चाँदी के दीप जलाऊँ।
दीपावली पर लाखों दीपों से,
अपना आँगन सजाऊँ।
पर इन समस्त उत्सवों में,
सबसे सुंदर चयन हो तुम।
मेरी हर छोटी-बड़ी प्रसन्नता का,
कारण हो तुम।
तुम वह संपदा हो,
जिसका कभी अवमूल्यन न हो।
तुम वह संबंध हो,
जिसका कभी विस्मरण न हो।
तुम्हें पाकर जाना है,
प्रेम भी एक वरदान होता है।
किसी का होना भी,
जीवन का सबसे बड़ा धन होता है।
न समय की आँधी तुम्हें,
मुझसे दूर कर पाए।
न परिस्थितियों का अँधियारा,
इस प्रेम को मिटा पाए।
हर जन्म में तुम्हारा ही साथ माँगूँ,
यही मेरा प्रण हो।
मेरे जीवन की प्रत्येक दीपशिखा में,
तुम्हारा ही स्पंदन हो।
क्योंकि तुम केवल चाहत नहीं,
मेरी आराधना हो।
तुम केवल संग नहीं,
मेरे जीवन की साधना हो।
तुम क्षणभर की आतिशबाज़ी नहीं,
प्रेम का चिर प्रकाश हो।
तुम मेरे हृदय की सबसे अनमोल,
और अमिट मिठास हो।
तुम दीपावली का पटाखा नहीं,
धनतेरस का धन हो प्रिये!
क्षणिक आकर्षण नहीं,
मेरे जीवन का चिरंतन हो प्रिये!
रचनाकार-पल्लवी श्रीवास्तव
ममरखा, अरेराज, पूर्वी चम्पारण (बिहार)


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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