मैंने खोज शुरू की
किसी प्रश्न के उत्तर से नहीं,
बल्कि उस मौन से
जो हर उत्तर के बाद भी बचा रहता है।
कभी लगा,
मैं समय से आगे चल रही हूँ;
फिर समझ आया,
मैं बस खुद से पीछे छूट गई थी।
युवा मन ने
भावनाओं को साक्ष्य मान लिया,
हर तीव्र अनुभूति को सत्य।
मैंने जो थामे रखा,
वह सत्य कम, आदत अधिक था;
और जिसे छोड़ने से डरती रही,
वह अक्सर बोझ निकला।
अतीत मेरे साथ चलता रहा,
न शत्रु की तरह,
न मित्र की तरह।
वह बस उपस्थित था,
कभी स्मृति बनकर,
तो,
कभी प्रतिक्रिया बनकर।
कुछ अनुभवों ने
मुझे सजाया नहीं,
संयमि त किया।
कुछ दरारों ने
मुझे कमज़ोर नहीं,
स्पष्ट बनाया।
फिर एक दिन
मैंने भागना बंद किया,
न आगे की ओर,
न पीछे की ओर।
वहीं ठहरकर देखा
कि जिसे खोज रही थी,
वह किसी दूरी पर नहीं थी।
खुद से मिलने के लिए
मुझे अतीत को मिटाना नहीं पड़ा,
बस उसे
अपने वर्तमान से अलग करना पड़ा।
और
अब मैं हल्की हूँ।
क्योंकि कम साथ रखती हूँ।
अब मैं शांत हूँ
क्योंकि हर शोर का उत्तर नहीं देती।
मेरी तलाश अब
किसी प्रमाण की मोहताज नहीं।
मैं जानती हूँ
कि जो मैं हूँ,
वह किसी संघर्ष का परिणाम नहीं,
बल्कि हर समझ का चयन है।
और शायद यही
खुद से खुद की तलाश है।
जहाँ पहुँचकर
खोजना समाप्त नहीं होता,
बस भटकना समाप्त हो जाता है।


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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