भीड़ बहुत संसार में, साथी मिले न कोय।
जो पीर पराई जान ले, साथी साचा सोय॥
सुख में संगत कौन की, दुख में कौन खड़ा।
दुख की घड़ी जो थाम ले, वही अपना बड़ा॥
बोले बिन जो बात पढ़े, आँखों का संवाद।
ऐसे मन के मेल को, क्या चाहिए अनुवाद॥
रिश्ते केवल देह के, छूटें काल के साथ।
मन से मन जो जुड़ गया, अमर हुआ वह साथ॥
स्वार्थ जहाँ तक साँस है, रिश्ते वहाँ तलक।
स्वार्थ मिटे तो प्रेम का, दीप जले पल-पल॥
टूटे मन की चुप्पियाँ, जो सुन पाए मौन।
उससे बढ़कर जगत में, अपना और न कौन॥
साथ वही जो धूप में, बन जाए शीतल छाँव।
अँधियारे में दीप हो, थामे मन का गाँव॥
माँग न हो, उम्मीद न हो, फिर भी रहे जुड़ाव।
ऐसा नाता मिल गया, जीवन हुआ सुहाव॥
अंत समय जब छूटता, तन-धन, जग-व्यवहार।
अखिल वही जो मन रहे, बनकर अंतिम प्यार॥
साथ शरीरों का नहीं, साथ रहे विश्वास।
जिसके होने से मन कहे, “अभी शेष है आस।”
डॉ. अखिलेश श्रीवास्तव


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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