मांगी गई चीज़
शायद पूरी अपनी नहीं होती—
न वक्त,
न रिश्ता,
न कोई शख़्स।
लेकिन कुछ लोग
इतने अपने लगते हैं
कि मन
अनजाने में उनके हिस्से की प्रतीक्षा करने लगता है।
वक्त
अगर हर बार पुकारना पड़े,
तो थकान उतर आती है भीतर,
फिर भी,
कभी-कभी दिल चाहता है
कि कोई बस इतना कह दे—
“मैं यहीं हूँ।”
सच्चा वक्त
शोर नहीं करता,
वह चुपचाप पास बैठता है
और बिना पूछे
थोड़ा-सा दुःख अपने हिस्से में ले लेता है।
रिश्ते
सिर्फ साथ चलने से नहीं बनते,
वह बनते हैं
उस छोटे-से ठहराव से
जहाँ कोई आपकी चुप्पी पढ़ ले।
कुछ लोग आए,
थोड़ी दूर तक साथ रहे,
फिर अपनी दुनियाओं में लौट गए।
उनसे शिकायत नहीं—
हर किसी के पास
अपनी-अपनी मजबूरियाँ थीं।
लेकिन उनके जाने के बाद
मन में जो खाली जगह बची,
वह देर तक बोलती रही।
और शख़्स...
जिसे रोकने के लिए
आत्मा तक झुकानी पड़े,
उसे शायद रुकना ही नहीं था।
फिर भी,
किसी अपने को जाते देख,
दरवाज़े तक चले आना
कमज़ोरी नहीं होता।
अपने लोग
हर बार जताते नहीं,
पर उनकी मौजूदगी
धीरे-धीरे जीवन में घुल जाती है—
जैसे ठंडी शाम में
दूर कहीं जलता हुआ दीपक।
इसलिए अब
मैंने मांगना कम कर दिया है।
न,इसलिए कि दिल पत्थर हो गया है,
बल्कि इसलिए
कि प्रेम को पकड़कर नहीं,
महसूस करके जीना चाहता हूँ।
जो मेरा होगा,
वह लौट आएगा
किसी धूप, किसी आवाज़,
किसी अनकहे स्पर्श की तरह।
और जो नहीं होगा,
उसे विदा करते हुए भी
मैं उसके हिस्से की कोमलता
अपने भीतर बचाए रखूँगा।
क्योंकि
हर चीज़ माँगकर नहीं मिलती,
पर जो सचमुच अपना होता है,
वह जाते हुए भी
मन में एक उजली जगह छोड़ जाता है।
डॉ अखिलेश श्रीवास्तव


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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