हमें तो है, आपको ही हम–पे यकीं क्यूं नहीं..
आसमां पूछता है, ये ज़मीं वो ज़मीं क्यूँ नहीं..।
आंखों में तो है, आफ़ताब की रौशनियां बहुत..
फिर ये नज़ारे, दिल के माफ़िक़ रंगी क्यूँ नहीं..।
अब भी वो ग़ज़ल कहते हैं, हुस्न-ओ-इश्क पर..
मगर अब वो, नज़ाकत-ए-अदा हसीं क्यूँ नहीं..।
रगों में है लहू का अब भी वही, रंग-ए-मिजाज़..
मगर अब इन आंखों में, हया-ए-नमी क्यूँ नहीं..।
महफ़िल में हर कोई था, नज़र-ए-ज़द में उनकी..
सब दिखाई दिए थे उनको, मगर हमीं क्यूँ नहीं..।
पवन कुमार "क्षितिज"


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
The Flower of Word by Vedvyas Mishra







