हमी ने हमी को मारा है,
तो इसमें खुदा का क्या कुसूर,
अनजानी मौत ले गई तुम्हें,
तो इसमें कुदरती फ़ना का क्या कुसूर,
मोहब्बत होके जुदा ही तो करती है,
इसमें तुम तन्हा का क्या कुसूर,
दोस्ती से ही प्रेम हो जाएँ,
इसमें मन के ख्याल,
और होठों की जुबां का क्या क़ुसूर
छुपे हुए पर्दों में तुम ही थे,
इसमें हमारी निगाह का क्या क़ुसूर,
दुश्मनी ही दुरुस्त ना रह पाए,
इसमें अना के इल्ज़ाम का क्या क़ुसूर,
तोहफा ही दिए हो वापिस लेने को,
आखिरी नीयत में नियति का क्या कुसूर,
बर्दाश्त नहीं होता है "ललित "किसी को इतना सुन ले,
अब पहले ही बना लोगे सभी के चेहरे,
इसमें उन बेजुबान अदाओं का क्या कुसूर। ।
- ललित दाधीच


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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