तिरंगे की हवा में आज फिर कुछ बात लगती है,
मेरे भारत की मिट्टी भी मुझे सौगात लगती है।
शहीदों ने लहू देकर हमें जो राह दिखलाई,
उसी राह पर चलना ही मेरी औकात लगती है।
न मंदिर से, न मस्जिद से, न मज़हब से अलग भारत,
जहाँ दिल मिलके धड़कें, वो यही बारात लगती है।
किसी के हाथ में हल हो, किसी के हाथ में सीमा,
यही मेहनत मेरे भारत की असली जात लगती है।
जो बेटी खुलके सपने देख पाए अपने जीवन के,
वही आज़ाद भारत की मुझे शुरुआत लगती है।
न ऊँचा हो कोई इतना कि दूजे को छोटा समझे,
समानता की यही सोच हमें खास बात लगती है।
पंद्रह अगस्त केवल एक तारीख नहीं मेरे लिए,
ये उन वीरों की यादों की अमर सौगात लगती है।
'मयंक' इतना ही चाहे देश का मान बढ़ता जाए,
मेरी हर साँस को भारत की खातिर मात लगती है।
तिरंगा यूँ ही ऊँचा हो, यही अरमान है दिल का,
मेरे हिंदुस्तान से बढ़कर न कोई बात लगती है।
रचनाकार :- डॉ. मयंकेश कुमार दुबे(शिक्षक एवं लेखक)
एम.ए. इतिहास(गोल्ड मेडलिस्ट )
औलेंडा,आगरा (उत्तर-प्रदेश)
मो. :-8630291252, 8979776231


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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