घर में कुछ न बचा था, खुदा बन खरीदार आया है।
बेच कर वोट, उसने एक वक्त का खाना खाया है।
क्या हुआ जो उसने बेच दिया, कुछ टुकड़ों की खातिर?
वतनपरस्तों ने बेच कर वतन, बेहिसाब माल बनाया है।
बँटती है शराब बेहिसाब, जब भी कहीं चुनाव आया है।
कसूर क्या किया है उसने, जो एक वक्त का खाना खाया है?
कई बार तपती धूप में, भीड़ बन वो पिघल कर आया है।
आज उसके घर में ही, कोई वोट का खरीदार आया है।
वतन की खातिर शहीद हुए जो, उनको कौन याद करेगा ?
दौर है कमाने का, उम्र भर बटोरने का, मुद्दत बाद आया है।


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
The Flower of Word by Vedvyas Mishra







