जो दर्द को हँसी में छिपाए हुजूर रहा।
वही सस्ते नशे के साथ-साथ जी रहा।।
असली मजा नसीब से बाहर रहा होगा।
शुक्रिया किस को करे बे-नाम जी रहा।।
चाहने भर से अगर बग़ावत फैल जाती।
फिर न हम जी रहे होते न वो जी रहा।।
हवा में धूल के कण मिलकर हुए ज़ख्मी।
वो जिसकी साँस में जाते न वो जी रहा।।
सुकून मिलता उसको आजकल 'उपदेश'।
जो चाहतों के रिवाजों के बगैर जी रहा।।
- उपदेश कुमार शाक्यावार 'उपदेश'
गाजियाबाद


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
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