“मैं—पराया धन—कभी थी ही नहीं।”
क्या बेदर्द ज़माना है
बेटी के जन्म लेते ही
उसे “पराया धन”कहकर
यह जता देता है
कि वह हमारी नहीं है।
कितनी अजीब विडंबना है
वही लड़की
उम्र के आख़िरी पड़ाव पर
सब बातों से अनजान हो जाती है,
अपने बच्चों तक के नाम भी
भूल जाती है।
पर नहीं भूलती
अपने माता- पिता, भाई- बहन
और अपने बचपन की वो यादें,
जो उसके दिल के धड़कने की
खूबसूरत वजह थीं।
शायद वह कभी परायी हुई ही नहीं थी,
पर दुनिया ने
न उसे मायके का समझा,
न ससुराल ने अपना कहा।
जन्म से मृत्यु तक
उसका पूरा सफ़र
या तो ज़िम्मेदारियों में रहा,
या फिर अकेलेपन की खामोशी में..
वन्दना सूद
सर्वाधिकार अधीन है


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
The Flower of Word by Vedvyas Mishra







