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Dastan-E-Shayara By Reena Kumari Prajapat

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The Flower of WordThe Flower of Word by Vedvyas Mishra
The Flower of WordThe novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra

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The novel 'Nevla' (The Mongoose), written by Vedvyas Mishra, presents a fierce character—Mangus Mama (Uncle Mongoose)—to highlight that the root cause of crime lies in the lack of willpower to properly uphold moral, judicial, and political systems...The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra

कविता की खुँटी

                    

“मैं—पराया धन—कभी थी ही नहीं।”

“मैं—पराया धन—कभी थी ही नहीं।”
क्या बेदर्द ज़माना है
बेटी के जन्म लेते ही
उसे “पराया धन”कहकर
यह जता देता है
कि वह हमारी नहीं है।

कितनी अजीब विडंबना है
वही लड़की
उम्र के आख़िरी पड़ाव पर
सब बातों से अनजान हो जाती है,
अपने बच्चों तक के नाम भी
भूल जाती है।

पर नहीं भूलती
अपने माता- पिता, भाई- बहन
और अपने बचपन की वो यादें,
जो उसके दिल के धड़कने की
खूबसूरत वजह थीं।

शायद वह कभी परायी हुई ही नहीं थी,
पर दुनिया ने
न उसे मायके का समझा,
न ससुराल ने अपना कहा।

जन्म से मृत्यु तक
उसका पूरा सफ़र
या तो ज़िम्मेदारियों में रहा,
या फिर अकेलेपन की खामोशी में..
वन्दना सूद


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सर्वाधिकार अधीन है


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रचना के बारे में पाठकों की समीक्षाएं (7)

+

मनोज कुमार सोनवानी "समदिल" said

वाह!! वन्दना मेम, क्या खूबसूरत हृदयस्पर्शी कविता लेकर आयीं है। गज़ब। सचमुच पैदा होते ही बेटियों को पराया धन ही समझकर परवरिश की जाती है।पर, माता पिता अगर अस्पताल में हो तो सबसे पहले बेटी ही ससुराल से पहुंचती है। सादर प्रणाम 🙏🌹" हर दाग दोनों ओर की धोती हैं बेटियां, इसलिए गंगलहर सी होतीं हैं बेटियां।"

वन्दना सूद replied

लाइफ की बहुत बड़ी एक चोट है जो संस्कारों और रीति रिवाजों की दी हुई है । इसलिए इसमें गलती किसी की भी नहीं है सिर्फ एक feel है जो लिखा है 🙏🙏

जयश्री विलास जोधंळे said

सही कहा है वंदना जी लडकी को पराया जरूर समजा जाता है मगर वो कभी मैका और ससुराल वालो पराया नही समजती बडी निष्टा से सेवा करती है।

वन्दना सूद replied

जी बिल्कुल ऐसा ही है उसकी अपनी जिम्मेदारियों की वजह से दिखता नहीं किसी को 🙏

सरिता पाठक said

अति सुन्दर रचना एक लड़की के ह्रदय की पीड़ा का यथार्थ चित्रण है आपकी रचना मे एक लड़की जिसके लिए मायका भी पराया होता है और ससुराल भी कभी अपना नहीं समझता सारी जिंदगी जिम्मेदारियों का बोझ उठाते बीत जाती है अंत मे बुढ़ापे मे जब उसकी जिम्मेदारियां पूरी हो जाती हैं तब तक स्वयं को bhi भूल जाती है उसकी इच्छाएं अरमान सब मर चुके hote हैं तब वो खामोश हो जाती है उसे याद रहता है to बस वो पल जो उसने आपने माता पिता और भाई बहनों के सग आशाओं के सागर मे डुबकी लगाते हुए गुजारे थे दिल chhu लिया 🌹❤️👌वन्दना जी को सादर प्रणाम 🙏🙏

वन्दना सूद replied

actually, सरिता जी अपनी mother-in-law को देखती हूँ तो यही फील होता है जो लिखा क्योंकि 89 ki age mein woh sab bhul jaati hain apne bachon tak ke naam bhi par apne parents, apne bhsi behan , apne bachpan ki baatein nahi bhulti .kya gazab ke lekh hain likhne wale ke 🙏🙏😊

आलम-ए-ग़ज़ल - परवेज़ अहमद said

न उसे मायके का समझा, न ससुराल ने अपना कहा!
जन्म से मृत्यु तक उसका पूरा सफ़र या ज़िम्मेदारियों में रहा या फिर अकेलेपन की ख़ामोशी में!!
वाह! बहुत ख़ूब! बेहद उम्दा और बेहतरीन कविता लिखी है आपने, वन्दना जी! लाजवाब! बे-मिसाल! 👌👌👏👏❤️🙏😊

वन्दना सूद replied

मेरे सिर्फ शब्द हैं एहसास किसी ओर के दौर का है जो मैंने शब्दों में पिरोया 🙏😊

उपदेश कुमार शाक्यावार said

उच्च विचार दर्शाती रचना के लिए प्रणाम

वन्दना सूद replied

🙏🙏

रीना कुमारी प्रजापत said

Bahut bdhiya

वन्दना सूद replied

🙏🙏

आलम-ए-ग़ज़ल - परवेज़ अहमद said

नये साल की ढेरों बधाईयाॅं और शुभकामनाऍं! ख़ुदा करे ये नया साल आपकी ज़िंदगी में ढेर सारी ख़ुशियाॅं, ख़ुशहाली, शांति, तरक़्क़ी लाए! आपको हर क़दम पे कामयाबी मिले और आपकी हर मुराद पूरी हो! आदाब, वन्दना जी! 💐💐❤️🙏🙂

वन्दना सूद replied

बहुत बहुत शुक्रिया आपकी खूबसूरत blessings का 🙏🙏😊आपकी ज़िन्दगी का हर पल दुआओं से भरा हो यही दुआ है हमारी 🙏🙏नव वर्ष की आपको और आपके परिवार को हार्दिक शुभकामनाएँ

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