राज़-ए-इश्क़ अभी भी उलझा उलझा सा,
दूर होते ही ये तो सुलझा सुलझ गया।।
भीतर इतनी उलझने है बारीक छोटी सी जरूरी,
बाहर देखा तो मैं सुलझा सा लगा,
और मान लिया कि मैं ही हूं और अकेला हूं,
कितना अजीब तरीके से बड़ा हो गया।
पास जाता हूं तो उलझनों में फंस जाता हूं,
दूर होते ही तो मुझे सब एक जैसा दिखता है,
फिर यही देखता उनके पास से गुजर के दूर चला जाता हूं।
घर इतने है,
दुनिया एक है,
बातें इतनी है,
जमाना एक है,
सांसे इतनी है,
जिंदगी एक है,
शब्द इतने है,
पर परिचय एक है,
दौड़ भाग इतनी है,
नींद एक है,
उलझनों में तो मेरे शरीर अलग थलग पड़े हैं,
बस सुलझा के मुझे रख देते हो।
राहत ए शौक नहीं था उलझनों का,
सुलझना नहीं जीना था,
वहीं आकर सब अटक गया।।
- ललित दाधीच


The Flower of Word by Vedvyas Mishra
The novel 'Nevla' (The Mongoose) by Vedvyas Mishra
The Flower of Word by Vedvyas Mishra







